Threats to Healthcare Information – Hindi

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Health insurance Threats – Hindi 

Delhi : 
एक सवाल आप किसी भी पालिसी होल्डर से कीजिए की क्या आप अपने  हेल्थ पॉलिसी का डॉक्युमेंट को ढंग से पड़ते हैं ? और काफी लोगो से आपको इसका जबाब सिर्फ ना में ही मिलेगा । खासतौर पर लोगो को इसका अर्थ तब पता चलता है जान तक उन्होंने खुद कभी क्लेम न किया हो। असल में लोग क्लेम इन्शुरन्स सर्च करते समय नहीं पड़ते हैं और हेल्थ क्लेम (health claim ) रिजेक्ट होने के बाद ही ज्यादातर हेल्थ पॉलिसीहोल्डर्स अपनी  पॉलिसी डॉक्युमेंट को सही से  पढ़ते हैं.

  • देखा जाता है  कि – इंश्योरेंस कंपनियां डॉक्युमेंट में जिस भाषा का इस्तेमाल करती हैं, उसे समझना लगभग आसान नहीं होता। इस उलझन को दूर करने के लिए इंश्योरेंस रेग्युलेटरी ऐंड डिवेलपमेंट अथॉरिटी (IRDAI ) ने हाल ही में एक पेज की ‘कस्टमर इंफर्मेशन शीट’ का प्रस्ताव रखा था। इसमें आसान भाषा में कस्टमर्स को पॉलिसी के टर्म्स ऐंड कंडिशन के बारे में बताया जाएगा।
  • इरडा ( IRDAI ) ने यह भी इशारा किया है कि इसका पालन सभी इंश्योरेंस कंपनियों को करना होगा। इसके बावजूद भी  पॉलिसी डॉक्युमेंट को सही तरह से न  पढ़कर हम गलती कर बैठते हैं।
  • सही तरीके से पॉलिसी डॉक्युमेंट को पढ़ने से आप भविष्य में कई दिक्कतों को टाल सकते हैं । और  पॉलिसी पर दस्तखत करने से पहले डॉक्युमेंट्स (Health insurance advice) को सही तरह से पढ़ने चाहिए।

IRDAI की पहल से आसान होगा रास्ता 

  • IRDAI यानि इंश्योरेंस रेग्युलेटरी ऐंड डिवेलपमेंट अथॉरिटी ने बीमा कंपनियों से उन बीमारियों की लिस्ट तैयार करने के लिए कहा  है, जिसका जिक्र  कवर पॉलिसी में नहीं होगा।  साथ ही वह सभी कंपनियों के लिए एक जैसी लिस्ट के हक में है।
  • अभी प्रत्येक कंपनी अलग-अलग  बीमारी को कवर नहीं करती है। जिनमे आम तौर पर प्रीवेंटिव हेल्थकेयर चेकअप, डेंटल ट्रीटमेंट,  डायग्नोस्टिक टेस्ट्स, इलाज के बाद टॉनिक, वीलचेयर पॉलिसी के दायरे में नहीं आते। वहीं, कुछ बीमारियों को शुरू के 1-2 साल में कवर नहीं किया जाता। मिसाल के लिए पहले साल में मोतियाबिंद और पाइल्स के इलाज का खर्च इंश्योरेंस कंपनी नहीं उठाती। अगर मेडिकल वजह न हो, तो कॉस्मेटिक सर्जरी का खर्च भी इंश्योरेंस कंपनियां नहीं उठातीं।

क्या होता है सब-लिमिट
आपको बतादें  की कुछ नई इंश्योरेंस कंपनियां सब-लिमिट्स को खत्म कर रही हैं, ज्यादातर पॉलिसी में रूम रेंट, सर्जन की फीस, ऑपरेटर थियेटर चार्जेज जैसी चीजों पर खर्च की लिमिट  पहले से ही तय है।

कुछ जायज वजह जो इन्शुरन्स कंपनियां बताती हैं 

  •  कई इंश्योरेंस पॉलिसी ने लिखा होता है कि सिर्फ जरूरी खर्च का ही क्लेम लिया जा सकता है। यानि मतलब यह है कि अगर हॉस्पिटल किसी सर्जरी के लिए आपसे पांच  लाख रुपए वसूल करता हैं  और सामान्य तौर पर उसकी कॉस्ट एक लाख  रुपए आती है, तो इंश्योरेंस में आपको कम रकम का भुगतान ही मिलेगा।
  •  इन्शुरन्स कंपनियां ‘इस क्लॉज का इस्तेमाल करके आपके जरुरत से ज्यादा खर्च करने पर Question  उठा सकती है।’

क्लेम का अतिरिक्त भार और लोडिंग 

  • कई पॉलिसी में यह क्लॉज होता है, इससे आपका प्रीमियम बढ़ता है। क्लेम करने के बाद इस क्लॉज की वजह से आपका प्रीमियम कभी-कभी 200 फीसदी तक बढ़ सकता है।
  • अलग-अलग बीमा कंपनी की लोडिंग पॉलिसी अलग-अलग होती है। इसलिए हेल्थ प्रोडक्ट खरीदते वक्त इस पर खास ध्यान देना चाहिए। हे
  • इससे प्रीमियम पर आपकी लॉन्ग टर्म प्लानिंग पर असर पड़ सकता है। कुछ प्रॉडक्ट्स पर 200 फीसदी तक की लोडिंग लग सकती है।’ अगर इरडा के प्रस्तावों को आखिरी तौर पर मान लिया जाता है तो पहले से तय लोडिंग तभी लागू होगी, जब लगातार तीन साल तक (एक साल पहले वाले को छोड़कर) क्लेम आपके प्रीमियम के 500 फीसदी से ज्यादा रहा हो।

हेल्थ इन्शुरन्स पालिसी का रिन्यूवल

हालाँकि कई सीनियर सिटीजन की तरफ से ऐसी  शिकायत मिलती है  कि उनकी उम्र के आधार पर इंश्योरेंस कंपनी ने रिन्यूअल की गुजारिश नहीं मानी। किन्तु आप निराश न हों  इस तरह के मामले में आप बीमा कंपनी को कोर्ट में घसीट सकते हैं। कंपनी सिर्फ  फर्जीवाड़े और गलत जानकारी देने पर ही रिन्यूअल को निरस्त  कर सकती है  इसके अलावा  के अलावा किसी भी आधार पर रिन्यूअल से इनकार नहीं कर सकती हैं।